Tuesday, November 1, 2016

Bhagavadgita 7-27, श्रीमद्भगवद्गीता ७-२७

श्लोकः
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।७-२७।।

सन्धि विग्रहः
इच्छा-द्वेष-समुत्थेन द्वन्द्व-मोहेन भारत।
सर्व-भूतानि सम्मोहम् सर्गे यान्ति परन्तप।।७-२७।।

श्लोकार्थः
हे परन्तप भारत! सर्व-भूतानि इच्छा-द्वेष-समुत्थेन
द्वन्द्व-मोहेन सर्गे सम्मोहम् यान्ति।

शब्दार्थः
7.27. इच्छा=desire द्वेष=hate समुत्थेन=arisen from द्वन्द्व=of duality मोहेन=by the illusion भारत=O scion of Bharata सर्व=all भुतानि=living entities सम्मोहम्=into delusion सर्गे=while taking birth यान्ति=go परन्तप=O conqueror of enemies

Meaning
7.27: Desire and hate arise from the dual nature of delusion, O Bharata. All living beings surge forth into delusion, O Parantapa.